Thursday, 30 April 2020

परमात्मा में आत्मा का एकभूत होना (Paramaatma Mein Aatma Ka Ekabhoot Hona)

लेखक – सुब्रह्मण्य सॊमयाजि
हिन्दी अनुवाद – पूजा धवन
(के जवाब मे :  lekhana@ayvm.in)



एक बार एक महान राजा था जिसने एक समृद्ध राज्य पर शासन किया था। वहां की प्रजा ने सदाचारी राजा को सदा सराहा। विधिवशात  एक बार शत्रुओं ने राज्य पर आक्रमण किया। आगामी युद्ध राजा के लिए ठीक नहीं हुआ और यह जल्द ही स्पष्ट हो गया कि राजा पराजित हो जाएगा। इस कारणवश उसके मंत्रियों ने उसे भाग जाने का परामर्श दिया। उन्होंने तर्क दिया कि, यदि राजा जीवित रहे तो संप्रभुता को उचित समय में वापस जीता जा सकता था। राजा अनिच्छा से सहमत हो गया और राज्य के हित में, अपने पत्नी और  शिशु के साथ जंगल में चला गया। जंगल के कठोर वातावरण में, वे लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकते थे। पहले रानी, तत्पश्चात राजा की मृत्यु हो गयी और वह अपने बच्चे को पीछे छोड़ गये। जंगल के कुछ शिकारियों ने बच्चे के रोने की आवाज़ सुनी, और दयापूर्वक उसे अपने साथ ले गए। बच्चा अन्य बच्चों के साथ बड़ा हुआ, और जल्द ही युवा अवस्था में प्रवॆश किया।

एक दिन, युवा राजकुमार अपने साथियों के साथ शिकार करने के लिए जंगल में गया। जंगल में एक तपस्वी ने देखा कि यह लड़का न केवल अपनी शारीरिक विशेषताओं जैसे निर्माण और रंग में, बल्कि व्यवहार और आचरन में भी दूसरों से अलग था। उन्होंने उसे समीप बुलाया और उसे स्वयं को एक दर्पण में परिक्षण करने और प्रतिबिंबित करने के लिए कहा। दर्पण से पता चला कि उसका शारीरिक व्यक्तित्व जैसे छाती, हाथ, रंग आदि अलग थे परन्तु स्वयं पर उनका प्रतिबिंब दूसरों से भिन्न व्यक्तित्व की ओर संकॆत कर रहा था। वह युवा आश्चर्यचकित था और कारण समझने के लिए लौटकर तपस्वी के पास गया। ऋषि, अतीत वर्तमान और भविष्य को जानने की क्षमता रखते हुए, उन्हें अपने अतीत से अवगत कराया, उन्हें एक राजकुमार के रूप में अपने कर्तव्यों का स्मरण कराया और उन्हें एक सेना बनाने और राज्य को वापस जीतने के लिए प्रोत्साहित किया। इसने राजकुमार के जीवन को बदल दिया। दृढ प्रयासों और समर्पण के साथ उन्होंने अपने लोगों को संगठित किया, युद्ध की कला में महारत प्राप्त किया, एक शक्तियुत सेना का निर्माण किया, शत्रुओं से युद्धकर उनको पराजित किया और राज्य को एक बार फिर प्राप्त कर लिया।

यह हम सभी की कहानी है। हमारे भीतर एक साम्राज्य है, आत्मा का भव्य उज्ज्वल साम्राज्य जो भगवान की गोद है। इंद्रियों द्वारा पराजित, हमने उस साम्राज्य को छोड़ दिया है और अपनी जंगल की तह में भटक गए हैं और स्वयं को खो दिया है। हमारी इंद्रियों द्वारा प्रदान किए गए क्षणिक सुख के लिए, हमने अपने आंतरिक आनंदों की असीमता का त्याग किया है। हम अपनी मूल स्वरूप भूल गए हैं और अपने इन्द्रियों की भूलभुलैया में अपना रास्ता खो बैठे हैं, जैसे कि राजकुमार के साथ हुआ। आदेश है कि हम अपने सच्चे स्वयं को समझते हैं, हमारे ऋषियों ने, बहुत दया के साथ, हमें "योग" का मार्ग दिया है और कुशलता से इसे अपने दैनिक जीवन में बुना है। यहाँ, हम योग के बारे में श्री श्रीरंगा महागुरु के शब्दों को याद कर सकते हैं, और वे कहते थे कि, "आत्मा का सर्वोच्च में विलय ही योग है"। योग का वास्तविक अर्थ है, विलय, अनंत में परिमित का अवशोषण। इस संगम को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए मार्ग को योग भी कहा जाता है। आइए हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह हम पर अपनी कृपा दृष्टी रखें जिस्से हम अपने मूल स्वरूप को दुबारा पह्चानें और अपने जीवन में योग - विलीनता के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।

सूचन : इस लेख का कन्नड़ संस्करण AYVM ब्लॉग पर देखा जा सकता है |    


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