Monday, 10 February 2020

दाम्पत्य भाव के लिए आदर्श (daampaty bhaav ke lie aadarsh)

लेखक् : टि .एन. सुरेश 
हिन्दी  अनुवाद : अर्चना वागीश 
के जवाब मे :  lekhana@ayvm.in 


सप्तपदी का मतलब है सात कदम |  'सखा सप्त पदा भव' यानी - साथ कदम रखने पर मेरे साथी बनो" ( पति पत्नी से) यह कहकर धर्ममय जीवन के खातिर अन्न प्राप्त करना चाहिए | इस उद्देश्य से पेहला कदम,  ज्ञानवान पुत्र प्राप्त करने के लिए दूसरा कदम, पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत करने की प्रतिज्ञा का प्रतीक  बनता है तीसरा कदम, चौथा कदम इन्द्रियभोग और आत्मयोग के सुख के लिए, पशु संपत्ति की  प्राप्ति और उनके उपयोग से स्वयं और समाज की सुख साधित करने के लिए पांचवा कदम, छठा कदम सारे ऋतुओं को धर्मकाम के उद्देश्य से नियमित उपयोग के लिए, सातवां और अंतिम कदम सम्पूर्ण जीवन को एक साथ हॊकर यज्ञ के समान संचालन करने की उद्देश्य से रखवता है| इन सब का तात्पर्य हैं  - धर्मपरिपालन के वास्ते समस्त सम्पत्ति आवश्यक है- ऐसे मनोभाव के साथ  अक्षतारॊप  करनी चाहिए | 'पारमार्थिक जीवन को प्रमुख स्थान देकर लौकिक जीवन को भारतीय समाज गौण मानती हैं' इस आरोप के उत्तर में यह एक सच्छा समाधान होता  है । और धर्म के चौखट में रहकर, जीवन की सभी व्यवहार को निभाकर चलने का विधान यहाँ पर हम सुस्पष्ट देख सकते हैं |

ऐसे ही आगे गृहिणी के लिए आशीर्वाद और आदेश हैं "सम्राज्ञी श्वशुरे भव", जिसका मतलब हैं, तुम पतिदेव की रानी, और शुद्ध मन से घर में सभी लोगों की रक्षा करने वाली महारानी बनकर सबकी सराहना अर्जित करने वाली बनो | एक मंत्र दिलचस्प बात कहती हैं- "तुम पति के सर पे चढ़ाई करो" | इस वाक्य का यह तात्पर्य नहीं है कि पति पर सवारी करो | सर ज्ञानस्थान है | सर चड़नेवाली तो ब्रह्मज्ञानी होनी चाहिए | इस ब्रह्मसुख का अनुभव करके जग में उसी सुख की वर्षा (तुम) करो - यही इस वाक्य का यथार्थ आशय हैं |

गृहिणी सबका योगक्षेम की जिम्मेदारी संभालने वाली  होने से – "न गृहं गृहमित्याहु: गृहिणी  गृहमुच्यते" यानी गृहिणी ही घर को सूचित कर्ती हैं ना कि बाहरी दीवारें/इमारत - ऐसी विचार का जन्म हुआ | आगे जाकर अश्मारोहण यानी पत्थर पर कदम रखने की प्रथा हैं | इधर गृहिणी को पत्थर की तरह अटल और अचल रहने का सन्देश हैं | अंदर और बाहर की शत्रुओं से संघर्ष करने में ऐसी ढृढ़ता और स्थिरता की ज़रुरत हैं | इस के बाद ध्रुव और अरुन्धती नक्षत्र के दर्शन करवाते हैं | ध्रुव तारा निश्छलता और अमरत्व का प्रतीक हैं |  आंतरिक ज्योतिर्मय परमात्मा का प्रतीक हैं | अरुंधति, हमेशा अपने पति वशिष्ठ का अनुसरण कर्ती हुयी, बाहरी आकाश में भी वसिष्ट नक्षत्र के समक्ष दिखाई देती हैं | पत्नी को अरुंधती का आदर्श और पति को ध्रुव का आदर्श याद दिलाने की कौशलता यहाँ हम देख सकते हैं |

दाम्पत्य जीवन के लिए आदर्श क्या हैं? वेदसाहित्य में, हम देखते हैं कि, 'तुम भुवि और मैं दिवि, पृथ्वी ही माता  दिवि ही पिता है' | दिवि में जो परमात्मभाव हैं वह भुवि (हमारे क्षेत्र) में भी विकसित होनी चाहिए |वहाँ जो ज्ञान है वह हमारे क्षॆत्र में भी विकास हॊनी चाहिऎ । पति परमात्मभाव  को पत्नी में प्रवेश करवाना चाहिए | पत्नी उस स्वरूप को संपूर्ण रक्षा करके ध्यान पूर्वक अपने गर्भाशय में उगाकर दुनिया में अवतरण करवाना चाहिए |

आज की स्थिति का विश्लेषण करते हुए श्रीरंगमहागुरु केहते थे "अगर निद्रा अवस्था में पड़ा हुआ शिशु को माँ दूध पिलाती हैं, सवेरे होने के बाद, अतृप्ति के कारण बच्चा पूछता हैं कि "तूने मुझे दूध क्यों नहीं पिलाया?" इसी तरह कर्मों को उनके अंतरार्थ जाने बिना करने से सच्ची तृप्ति/आस्वादन नहीं मिल रही हैं"|

"यज्ञम् प्रज्ञया कृतम्" ऋषियों ने जिस विज्ञान के साथ इन विषयों को हुम्हे दर्शाया हैं,  उस विज्ञान  की जानकारी के साथ  अगर कर्माचरण किया जाता है तब वे फलप्रद बनते हैं |  यह विचार सिर्फ विवाह के सीमित नहीं है बल्कि समग्र भारतीय संस्कृति को भी अन्वय होती हैं |

सूचन : इस लेख का कन्नड़ संस्करण AYVM  ब्लॉग पर देखा जा सकता है I


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