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Friday, August 21, 2020

राम मन्दिर से रामराज्य के छोर तक (Raam Mandhir Se Raamaraajy Ke Chhor Tak)

लेखक – डा मोहन राघवन
हिन्दी अनुवाद – पूजा धवन
(के जवाब मे :  lekhana@ayvm.in)



हमारी संस्कृति के लिये यह एक महत्वपूर्ण पल है, एक निर्वाह का दिन है जिसके लिये हमने सदियों तक प्रतीक्षा की है। शिशु राम लल्ला की अर्चा रूप में भगवान राम अपने जन्मस्थान में पुनः पदन्यास करने वाले हैं। इस दिन जब हमारे लाखों देशवासियों के प्रयास सफल हो रहे हैं, तो यह स्वाभाविक है कि हमारी छाती गर्व से फूल रही है और हमारे हृदय भक्ति से गदगद हो रहे हैं। क्या यह पोषित राम राज्य का पहला कदम हो सकता है? क्या प्रस्तुत समय और आने वाले समय में सनातन आर्य महर्षियों के भारत स्वर्णिम युग का पुनरागमन होगा? क्या यह संभव है? क्या ऐसी कल्पना संवैधानिक रूप से मान्य है? इस महत्वपूर्ण अवसर पर, हर्षोल्लास के साथ साथ इसके महत्व पर भी विचार करना उप्युक्त होगा। 'श्रीराम' शब्दमात्र से हमारे अन्तरङ्ग में विभिन्न भावनाएँ जागृत होति हैं । भक्तों के लिए वह परम है, परिपूर्ण अवतार है। दूसरों के लिए वह सत्य का प्रतीक है - वह वीर, जो प्रसन्न्ता पूर्वक अपने पिता की बात रखने के लिए सिंहासन से दूर जंगलों में चला गया। अनगिनत देशवासियों के लिए वह 'मर्यादा पुरुषोत्तम' है, जो सदाचार का प्रतीक है, जो धर्म को बनाए रखने के लिए नित्य समर्पित है । वह अतुलनीय और असहायशूर योद्धा थे

- जो हजारों को स्वयं ही परास्त करने में सक्षम थे। लोग अपनी रुची और स्वभाव के अनुसार उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं में से एक या अधिक से मोहित हो जाते हैं - उनकी समविभक्त सुंदर अंग, लंबी भुजायें, अपने भाइयों और प्रजा के प्रति प्रगाढ स्नेह, उनका नेतृत्व, प्रतिष्ठा का बोध, उनका गम्भीर व्यक्तित्व या उनके विभिन्न अनगिनत लक्षण।

राम के अनुयायियों और श्रद्धालुओं के साथ, ऐसे भी कई हैं जो मानते हैं कि राम काल्पनिक हैं; जो लोग सोचते हैं कि राम मन्दिर एक बहुत बडी अपव्यय है; कि यह राम राज्य का उन्माद हमारे समाज को रसातल में कर्षित करेगा; ऐसा राम राज्य हमारे संविधान के उल्लंघन में है। इन लोगों का मानना है कि प्रस्तुत समय में राम के शासनकाल की नहीं परन्तु मानवीय मौलयों के शासनकाल की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति और विचारधाराओं के बीच मे राम मन्दिर और राम राज्य का निर्माण सम्पूर्ण करना है। इसलिए यह आवश्यक है कि राम के प्रति हमारी श्रद्धा, उत्साह और विश्वास को हमारी परम्पराओं में सौंपी गई बुद्धि और तर्क के साथ सदृढ़ किया जाए। रामजी की वास्तविक समरूपता? जैसा कि सर्वविदित है, राम इक्ष्वाकु के वंश में जन्मित रघु के वंशज दशरथ के पुत्र थे। रामायण द्वारा ऋषि नारद ने स्वयं राम के जीवन और उपलब्धियों को ऋषि वाल्मीकि को पूर्ण रूप से वर्णित किया था। किन्तु यह सब ज्ञात होने के उपरान्त भी, वाल्मीकि जी ने महाकाव्य लिखना प्रारम्भ नहीं किया । वाल्मीकि की रामायण में वर्णित उनका ऐसा पोतारोहण आज के चलन में विचित्र माना जायेगा । उन्होंने कुशा घास को

पूर्वाभिमुख कर अपना आसन बनाया । आचमन करके अपनी सङ्कायों को शुद्ध करते हुए, वह ध्यान मुद्रा में अपने पवित्र आसन पर बैठ योग समाधि में मग्न हो गये। समाधि में उन्होंने राम के वास्तविक रूप, वैभव और गतिविधियों का स्पष्ट अवलोकन किया। रामजी का रूप, स्वरूप का दर्शन योग समाधि में इतना स्पष्ट दिखाई दे रहा था जैसे मानो कि करतलामलक (हथेली में आमला)। हृदय की गुफा में वह सर्वोच्च प्रकाश, जो योगिक अनुभव का सार है, वास्तव में राम के अतिरिक्त और कोई नहीं । राम शब्द का उगम 'रम्' धातु से होता है, जिसका अर्थ है 'आनन्दित करना'; योगी अन्तरंग आनन्द का अनुभव करते हैं और लोग राम के बाहरी रूप से आनन्दित होते हैं। इस प्रकार राम के व्यक्तित्व और गाथा का वर्णन कर पाने के लिए, व्यक्ति का महर्षि वाल्मीकि जैसे उच्च कोटि का तपस्वी और कवि होना अत्यावश्यक है । यही कारण है कि वाल्मीकि रामायण को हमारी परम्पराओं में इतनी उच्च मान्यता प्राप्त है।



रामावतार का रहस्य

यदि राम को वाल्मीकि का योगिक अनुभव माना जाये तो दशरथ के पुत्र राम कौन थे ? क्या वह एक कपोलकल्पित पात्र थे? क्या वह 'काल्पनिक' थे? हमारी परम्पराएं योगिक सत्य और ऐतिहासिक व्यक्तित्व के बीच के इस संबंध को 'अवतार' नाम से वन्दित करती हैं - एक अवतरण। एक अवतार, निहित और अमूर्त की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। उदाहरण के लिए, एक क्रोधित व्यञ्जक किसी अव्यक्त क्रोध की अभिव्यक्ति है। एक स्मित मुखाकृति, अन्तरानन्द का अवतार कहा जा सकता है। क्रोध और वासना, लालच और मोह, हिंसा और छल राक्षसी प्रवृत्ति के अवतार हैं। ऐसी मानुष गुणों के अवतरणों से हम भली भाति परिचित हैं | किन्तु मन की असाधारण या योगिक अवस्थाओं, और शक्तियों का अवतार या सांसारिक अभिव्यक्तियाँ अतीव दुर्लभ हैं। राम और कृष्ण अवतार को सर्वोच्च श्रेणी के ऐसे अवतार माने जा सकते हैं। ऐसे अवतारों में स्वाभाविक रूप से आत्म भाव और योगिक अवस्था की अभिव्यक्ति पूर्ण है। अवतार के समकालीन योगियों और तपस्वियों को जब इन अवतारों का दर्शन होता है, वह उन्हें मुग्धबन्ध और विस्मित कर देता है। उन्होंने जो कुछ भी अपने अंदर देखा, उसके हर पहलू को इस बाहरी व्यक्तित्व में प्रकट किया गया है - रूप, रंग, गति, कक्ष्या, कण्ठ, ध्वनि, गुण; समस्त स्वरूप। इस सब पर आधारित राम को आत्मदेव की मूर्ति का रूप माना जाता है। "रामो विग्रहवान धर्मः"। अन्य नश्वर यद्यपि राम और कृष्ण के अवतार रूपी प्रतीमा को नहीं जान पाये, तदापि उन्हें भी सुखद और तीव्र आनन्दमयी भावना का अनुभव हुआ ।  

राम और प्रजा पर प्रभाव

यदि हम किसी के क्रोधित मुख को देखें, तो यह स्वाभाविक है कि हम स्वयं क्रोध से भर जायेंगे। एक हंसमुख व्यक्ति अपने समक्ष प्रसन्न्ता भाव को बडाता है। यह प्रतिबिम्ब के एक सामान्य सिद्धांत को इंगित करता है, जिसमें हर भाव के पीछे अन्तर्निहित स्थितियां दर्शक के हृदय मे भी प्रतिबिंबित होते हैं। यदि किसी को महान अवतार अवलोकन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है, तो उसके रूप को मन में धारण करें और उनकी गतिविधियों का सटीक वर्णन अन्तर्मन में सुनें। ऐसा करने से हम स्वाभाविक रूप से योगिक अवस्था में पहुँच जायेंगे। राम राज्य में वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषियों को यह सौभाग्य निज था। राम अवतार में प्रत्येक आत्मगुण आविर्भूत थे। वह वास्तव में अपने भक्तों को प्रसन्न कर देने वाले अवतार थे। जो उसे देखता है, देखता ही रह जाता, वह पुनः पुनः दर्शनिच्छुक बनकर पुनः लब्ध दर्शन से भी अतृप्त रह जाते थे। वाल्मीकि वर्णित, रामजी के शब्द और ध्वनि मीठी और सहज थी। वह पूर्वभाषी थे | अपनी प्रजा की पीड़ा को देखकर उनका हृदय द्रवित हो जाता था। यद्यपि अधिपति, उनका मन संसारिक सुखों के प्रति वैराग्य से भरा था; इतना कि सिंहासन के सुख को छोड वनगमन मे दुख या क्रोध का अवलेश भी न था । परब्रह्मन के अवतरण का निर्णायक गुण यह है कि इसके व्यक्तित्व का प्रत्येक पहलू हमें सीधा योग की आन्तरिक अवस्थाओं की ओर अग्रसर कराता है। योगी और ऋषि ऐसे अवतार की पहचान कर सकते हैं। इस प्रकार वाल्मीकि ने रामायण के महाकाव्य को अपनी कविता में डालने का उद्यम शुरू किया । ऐसी कविता अपने श्रोताओं के मन में सीता और राम के व्यक्तित्व को पूरी तरह से डाल देती है। दिव्य दम्पति के गुणों का ध्यान करना योग की अव्यक्त प्रक्रिया द्वारा आध्यात्मिक आनंद को पुनः प्राप्त करने का एक साधन है। वास्तव में, यदि इस महाकाव्य - 'रामायण का पारायण' किसी राम परायण ज्ञानी द्वारा किया जाता है, तो प्रतिबद्ध और
अवशोषित श्रोताओं पर उसका प्रभाव योग के फल के समान ही होता है। यह उच्चतम योगिक स्थिति की ओर हमें ले जाता है।



रामराज्य और धर्म की रक्षा

जहाँ सौम्य राम, रावण के सम्मुख कालअग्नि के समान भीकर और भीषण रूप में दिखाई पड़ते हैं। जो दूसरों में दया, क्षमा और सन्तोष जैसे सौम्य और सुन्दर आत्म धर्म प्रबोधित करते हैं वही राम उन धार्मिक शक्तियों के विरोधी असुर शक्तियों को नष्ट करने के लिए दृढ़ भी रहते हैं। जो स्वास्थ्य की इच्छा रखता है, उसे कीटाणुओं पर विजय प्राप्त करनी ही पडती है। जो लोग जन कल्याण निहित पवित्रता, तपस्या और योगानुभव परमानन्द

की नींव पर बनाई गई सभ्यता के विरोधी हैं, उनका समूल नाश होना ही चाहिए। ऋषयाश्रम, गुरुकुल जैसे संस्थान को संरक्षित किया जाना चाहिए जो आत्मधर्म, संयम और पुरुषार्थमय जीवन के आधार हैं। इस प्रकार यह आवश्यक था कि ऋषि, उनकी तपस्या, उनके बलिदान और धर्म के उनके सुरक्षात्मक आदेश की रक्षा की जाए। यही राम और कृष्ण जैसे अवतार का लक्ष्य था। युद्ध में बाहरी शत्रु पर विजय प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान है, परन्तु हमारे हृदय में व्याप्त कुरीतियों से जूझना और हमें अत्मधर्म के पथ पर रखना सामान्यों के लिए असंभव ही है। सीता और राम ने अपने आदर्श आचरण और व्यक्तित्व द्वारा अपनी प्रजा में उच्च आदर्शों का आह्वान किया, जो वास्तव में यथार्थ रामराज्य की नींव थी। रामायण में वर्णित है कि राम के शासनकाल में प्रजा लोभ और अतिरेक से मुक्त थी। संतुलन की उनकी भावना और उनके चाव पर नियन्त्रण ने उन्हें संसाधनों का केवल इतना उपयोग करने के लिए प्रेरित किया, जितनी की जरूरत थी। प्रकृति में संतुलन इतना उपयुक्त था कि सर्व ऋतु क्रमिक और समय बध थीं। सबके हृदय सन्तुष्ट थे, चूल्हे प्रचुर्य थे और झोपड़ियों में समृद्धि थी। राज्य में भरमार वहाँ के राजा की अनुकम्पा थी। यहां तक कि सबसे कठिन समय में जब सीता और राम को अनगिनत पीड़ा उठानी पड़ी और उनके अपने निजी जीवन बिखर गए, उन्होंने अपना आचार ऐसा रखा जिससे उनकी प्रजा का धर्म के प्रति विश्वास और समर्पण शिथिल ना हो। प्रजा और समाज के अंतःकरणों में आत्मगुण और आत्म धर्म के बीज बोना, उन्हें सींचना और उनका पालन-पोषण करना रामराज्य के आदर्श हैं। हमारे जैसे आम लोग प्रायः अनियन्त्रित उत्साह, लालसा, असन्तोष और इंद्रिय ग्राम सम्बन्धित दोषों की आसुरी लंका में कैद हैं। राम के व्यक्तित्व को आत्मसात करने के माध्यम से, सीता याने मूर्तिमत शान्ति को पुनः प्राप्त करसकते हैं | हमारे हृदय की गुप्त गुफा में हमें आत्माराम को प्रतिष्ठित कर सकते हैं । योगियों को विदित हृदय की यह गुफा ही अयोध्या

है, जो अभेद्य है - जिसे बाहरी साधनों से नहीं जीता जा सकता है। यह केवल उच्चतम क्रम की तपस्या से प्राप्य है। किन्तु रामायण के अद्भुत उपकरण द्वारा हमें अत्यन्त सरलता से यह सब प्राप्य है। राम के लिए एक मन्दिर जिस प्रकार उपयुक्त परिस्थितियों में चुम्बक अन्य आधार वस्तुओं में चुम्बकत्व को प्रेरित करता है, वैसे ही अवतार चेतन और निर्जीव वस्तुओं में सदगुण उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। ऐसे महापुरुष किसी भी भौगोलिक क्षेत्र को 'पवित्र' कर 'तीर्थ' क्षेत्र में परिवर्तित सकते हैं - यह श्रीरंग महागुरु द्वारा प्रतिपादित एक अनुभवात्मक और प्रायोगिक सत्य था। इस प्रकार के स्थान तपस्या, पूजा और अन्य आध्यात्मिक साधनों के लिए एक आदर्श बन जाते हैं। श्रीराम ने हमारे देश भर में यात्रा करते हुए अन्य स्थानों को जैसे - चित्रकूट, प्रयाग, दंडकारण्य, पञ्चवटी, हम्पी, रामेश्वरम, धनुषकोटि, लंका और उन सभी में सर्वाधिक अयोध्या, तीर्थक्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। यदि अयोध्या को आध्यात्मिक साधना के मन्दिर के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है, तो यह अनगिनत पुरुष और महिलाओं के लिए हर्ष, शान्ति और आन्तरिक आनंद का आश्रय होगा। अस्पताल, स्कूल और ऐसे अन्य संस्थान बहुत महत्वपूर्ण हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। परन्तु यह सब सामान्य प्रभाव युक्त अन्य किसी स्थान में भी निर्मित हो सकते हैं। यदि आध्यात्मिक खोज के लिए पवित्र स्थानों का उपयोग किया जाता है, तो इस प्रक्रिया से हमें लाभ होगा, भगवान राम को नहीं। इस ऐतिहासिक अवसर पर, हम अत्यन्त कृतज्ञता और श्रद्धा भाव से श्रीरङ्ग महागुरु की तपस्या प्रेरित योगदान को सम्मानपूर्वक याद करते हैं जिस के द्वारा उन्होंने हमे राम, रामायण और रामराज्य का सार प्रस्तुत किया । यह केवल उस महानता के कारण है कि इस ऐतिहासिक

अवसर पर हम सभी हाथ जोड प्रार्थना और आशा करते हैं कि अयोध्या में राम का निवास हम सभी को हमारे अन्तर्मन की अयोध्या के आनंद की चरम अवस्था तक ले जाए। यह हमारे हृदय, घर-द्वार , समाज, देश और सम्पूर्ण जगत में राम राज्य की स्थापना की दिशा में पहला कदम हो सकता है - एक ऐसा राज्य जहाँ राम और सीता का आत्म धर्म पूर्णरूप से पल्लवित होता है।

सूचन : इस लेख का  अंग्रेज़ी  संस्करण AYVM ब्लॉग पर देखा जा सकता है |     

Sunday, June 28, 2020

चित्रकला का अन्तरार्थ (Citrakala Ka Antharartha)

लेखक – डा० हर्षा सिंहा 
हिन्दी अनुवाद – पूजा धवन
(के जवाब मे :  lekhana@ayvm.in)



वह कला जो मन को - चित्त  को - आकर्षित करती है – उसॆ चित्र कला कहतॆ हैं - चित्रण की कला । जब एक महान आत्मा एक सुंदर चित्र को देखती है, तो पर्यावरण की सुंदरता से आकर्षित मन चित्रण की परिस्थितियों का आनंद लेता है8+। क्योंकि चित्रण (चित्र) एक व्यक्ति के मन को विषय के प्रति आकर्षित करते हैं और एक स्वाद (रस) उत्पन्न करते हैं और उसे आनन्दित करते हैं, उन्हें चित्र (कला) कहा जाता है। मूर्तिकला यां शिल्पकला भी इस तत्व को परिपूर्ण रूप से सिद्ध करती है जिस कारण से विशेषज्ञों द्वारा मूर्तिकला को भी चित्र कला कहा जाता है।

चित्र का विषय कलाकार पर निर्भर है। इंद्रियां, मन और उनकी मनोदशा कलाकार के मन पर एक छाप सृजित करती है और उसका कूंचा इन मानसिक चित्रों को दर्शाता है । जो पर्यवेक्षक का मन भी चित्र वीक्षण से चित्रकार के हृदय या मनस्थिति की ओर ले जाता है ।  इस रहस्य को जानने के बाद, भारत के ऋषियों ने चित्रों और मूर्तियों के माध्यम से प्रकृति, देवताओं और गन्दर्वों के रहस्यों को प्रकाशित किया है जो उन्होंने ध्यान अवस्था में अनुभव किए । इन चित्रों और मूर्तियों को निरन्तर देखने से, तपस्या की भांति, धीरे-धीरॆ परन्तु निश्चित रूप से हमारा मन ऋषियों की तपस्थिति का अनुभव करता है और उनके द्वारा अनुभव किए गए आनन्द का आभास करता है , अंततः उसे सृष्टि के मूल में प्रभु के निवास में ले जाता है - उनके असीम (आनन्द) और उनके रस (अमृत) में । शिल्पा (मूर्तिकला) का अर्थ ही समाधि है-अनन्त में विलय। आसन, दृष्टिकोण, दृष्टि, सौंदर्य, भगवान की मूर्तियों की मुस्कुराहट और प्रतिरूप, मन को सुंदरता, परम के विलय और अनुभव की ओर प्रेरित करती है।

मन्दिरों में, मुख्य देवता की मूर्ति के अतिरिक्त, प्रकृति की सुंदरता, जानवरों, पक्षियों और यहां तक कि सांसारिक जीवन का चित्रण करते हुए अन्य मूर्तियाँ, चित्र भी हो सकते हैं। यह वैसा ही है जब हम जोग फॉल तक की यात्रा करते हैं, तो क्या हम हरे जंगलों की प्राकृतिक सुंदरता, रास्ते में भोजन और यात्रा का आनंद नहीं लेते हैं? फॉल्स को अचंभित करने के अतिरिक्त, हम अन्य स्मृतियों में भी रहस्योद्घाटन करते हैं। इसी तरह, यद्यपि हम अभयारण्य के गर्भगृह के अन्दर देवता की मूर्ति का आनन्द लेते हैं, हम रास्ते में उनकी रचना की भव्यता के किरमिच का भी आनन्द लेते हैं। हम उनकी विभूति (विशालता) से प्रभावित हैं। एक महान आत्मा प्रकृति की सुखदायक जंगल की गोद, पहाड़ों और पहाड़ियों में उसकी उदात्तता, उसके महासागरों के तट पर उसकी विशालता और गहरे नीले तारों वाले आकाश में उसकी चमक की हरियाली का आनन्द लेती है। जैसा कि श्री श्री रंगा महागुरु द्वारा बताया गया है, "क्योंकि भगवान की रचना की पहेली उनकी छाप और हस्ताक्षर को वहन करती है, उन्हें देखते हुए, मन को उसके प्रति, धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से प्रेरित करता है। मन मौन की गहराई में गोता लगाता हुआ अल्प मात्रा में ही किन्तु परमानन्द का अनुभव करता है।" इस दृष्टिकोण से, उनकी पूरी रचना उनका चित्र, उनकी मूर्तिकला है। वह, प्रकाशमयि भगवान, सच्चे कलाकार हैं और हर दूसरे कलाकार के लिए आदर्श हैं। इस सार्वभौमिक कलाकार की कला, जिसने इस ब्रह्मांड का निर्माण किया है, हमारी भूमि भारत की सभी कलाओं का आधार है।

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Thursday, April 30, 2020

परमात्मा में आत्मा का एकभूत होना (Paramaatma Mein Aatma Ka Ekabhoot Hona)

लेखक – सुब्रह्मण्य सॊमयाजि
हिन्दी अनुवाद – पूजा धवन
(के जवाब मे :  lekhana@ayvm.in)



एक बार एक महान राजा था जिसने एक समृद्ध राज्य पर शासन किया था। वहां की प्रजा ने सदाचारी राजा को सदा सराहा। विधिवशात  एक बार शत्रुओं ने राज्य पर आक्रमण किया। आगामी युद्ध राजा के लिए ठीक नहीं हुआ और यह जल्द ही स्पष्ट हो गया कि राजा पराजित हो जाएगा। इस कारणवश उसके मंत्रियों ने उसे भाग जाने का परामर्श दिया। उन्होंने तर्क दिया कि, यदि राजा जीवित रहे तो संप्रभुता को उचित समय में वापस जीता जा सकता था। राजा अनिच्छा से सहमत हो गया और राज्य के हित में, अपने पत्नी और  शिशु के साथ जंगल में चला गया। जंगल के कठोर वातावरण में, वे लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकते थे। पहले रानी, तत्पश्चात राजा की मृत्यु हो गयी और वह अपने बच्चे को पीछे छोड़ गये। जंगल के कुछ शिकारियों ने बच्चे के रोने की आवाज़ सुनी, और दयापूर्वक उसे अपने साथ ले गए। बच्चा अन्य बच्चों के साथ बड़ा हुआ, और जल्द ही युवा अवस्था में प्रवॆश किया।

एक दिन, युवा राजकुमार अपने साथियों के साथ शिकार करने के लिए जंगल में गया। जंगल में एक तपस्वी ने देखा कि यह लड़का न केवल अपनी शारीरिक विशेषताओं जैसे निर्माण और रंग में, बल्कि व्यवहार और आचरन में भी दूसरों से अलग था। उन्होंने उसे समीप बुलाया और उसे स्वयं को एक दर्पण में परिक्षण करने और प्रतिबिंबित करने के लिए कहा। दर्पण से पता चला कि उसका शारीरिक व्यक्तित्व जैसे छाती, हाथ, रंग आदि अलग थे परन्तु स्वयं पर उनका प्रतिबिंब दूसरों से भिन्न व्यक्तित्व की ओर संकॆत कर रहा था। वह युवा आश्चर्यचकित था और कारण समझने के लिए लौटकर तपस्वी के पास गया। ऋषि, अतीत वर्तमान और भविष्य को जानने की क्षमता रखते हुए, उन्हें अपने अतीत से अवगत कराया, उन्हें एक राजकुमार के रूप में अपने कर्तव्यों का स्मरण कराया और उन्हें एक सेना बनाने और राज्य को वापस जीतने के लिए प्रोत्साहित किया। इसने राजकुमार के जीवन को बदल दिया। दृढ प्रयासों और समर्पण के साथ उन्होंने अपने लोगों को संगठित किया, युद्ध की कला में महारत प्राप्त किया, एक शक्तियुत सेना का निर्माण किया, शत्रुओं से युद्धकर उनको पराजित किया और राज्य को एक बार फिर प्राप्त कर लिया।

यह हम सभी की कहानी है। हमारे भीतर एक साम्राज्य है, आत्मा का भव्य उज्ज्वल साम्राज्य जो भगवान की गोद है। इंद्रियों द्वारा पराजित, हमने उस साम्राज्य को छोड़ दिया है और अपनी जंगल की तह में भटक गए हैं और स्वयं को खो दिया है। हमारी इंद्रियों द्वारा प्रदान किए गए क्षणिक सुख के लिए, हमने अपने आंतरिक आनंदों की असीमता का त्याग किया है। हम अपनी मूल स्वरूप भूल गए हैं और अपने इन्द्रियों की भूलभुलैया में अपना रास्ता खो बैठे हैं, जैसे कि राजकुमार के साथ हुआ। आदेश है कि हम अपने सच्चे स्वयं को समझते हैं, हमारे ऋषियों ने, बहुत दया के साथ, हमें "योग" का मार्ग दिया है और कुशलता से इसे अपने दैनिक जीवन में बुना है। यहाँ, हम योग के बारे में श्री श्रीरंगा महागुरु के शब्दों को याद कर सकते हैं, और वे कहते थे कि, "आत्मा का सर्वोच्च में विलय ही योग है"। योग का वास्तविक अर्थ है, विलय, अनंत में परिमित का अवशोषण। इस संगम को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए मार्ग को योग भी कहा जाता है। आइए हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह हम पर अपनी कृपा दृष्टी रखें जिस्से हम अपने मूल स्वरूप को दुबारा पह्चानें और अपने जीवन में योग - विलीनता के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।

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Tuesday, March 31, 2020

व्यवस्थित मन नामक महान उपकरण (Vyavasthita Mana Namaka Mahana upakarana)

लेखक:तारॊडि सुरॆश 
हिन्दी अनुवाद:– पूजा धवन
(के जवाब मे :  lekhana@ayvm.in)


हमारा मन हमारे जीवन पर राज करता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि मन हमेशा सही है । सुसंस्कृत या व्यवस्थित मन एक शान्तिपूर्ण और शान्त जीवन के लिए मार्गदर्शन करता है; ना कि दुख कि ओर  । भारत की संस्कृति जो है, उसे इस तरह से रचा गया है कि भोजन, बात, मनोरंजन, व्यवसाय, देने और लेने आदि की प्रथाओं और आदतों को शुद्ध मन सभी गतिविधियों पर नियंत्रण रखने में सक्षम बनाता है ।

दो मित्र धार्मिक यात्रा पर गए थे । वे कई धार्मिक स्थानॊं की यात्रा करने के बाद पवित्र शहर तिरुपति आए । सात पहाड़ियों पर चढ़ने में किया गया थोड़ा सा प्रयास भगवान वेंकटेश्वर के महान और राजसी दिव्य निवास में लाता है । पहाड़ियों की तलहटी पर स्थित तिरुपति शहर भी अत्यन्त सुंदर है। आत्मा को ओज प्रदान करने के अतिरिक्त,  यह इंद्रियों को कई आनंद भी प्रदान करता है । अब एक मित्र मन्दिर जाने की असुविधा नहीं उठाना चाहता था । अन्यथा वह स्वादिष्ट भोजनालयों में अपनी जीह्वा को तृप्त करने और आकर्षक जगह और चलचित्रा को अवशोषित करने के लिए जाना चाहता था ।  तो एक मित्र पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर की ओर गया और दूसरा स्थल अवलोकन करने लगा । दोनों की नियत समय पर मृत्यु हो गई । आश्चर्य की बात है कि जो व्यक्ति भगवान की एक झलक पाने के लिए सात पहाड़ियों पर चढ़ गया था, उसे मृत्यु के स्वामी के सेवकों द्वारा नरक में खींच लिया गया था । स्वर्ग के प्रहरी दूसरे को अपने राज्य में ले गए । यह कैसे उचित हो सकता है, एक उचित प्रश्न है । गहराई से विश्लेषण इस रहस्य को समझने में सहायता करेगा । 

जो व्यक्ति शहर का आनंद लेने वाला था वह दुखि था कि उसनॆ कित्नी बडी भूल करी और प्रभु कॆ दर्शन के लिए नहीं जा पाने के कारणवश उसका मन उदास था । उनका मन प्रभु, उनकी भव्यता और दिव्यता के विचारों में डूबा हुआ था । यद्यपि दूसरे व्यक्ति ने पहाड़ियों पर चढ़ने का प्रयास किया था, परन्तु उसका मन उसका दोस्त क्या कर रहा होगा इसमें लीन था । इस पूरे समय में उसे लग रहा था कि उसे भी अपने मित्र के साथ सुख का आनंद लेना चाहिए था । यद्यपि  उन दोनों के शरीर वहीं पर थे जहां वे दोनों चाहते थे परन्तु उनका मन कहीं और था । परिणाम यह हुआ कि एक नरक में गया और दूसरा स्वर्ग में। 

हमारे बुरे और अच्छे (पाप और पुण्य) कर्मों के परिणाम, हमारी बुद्धि या मन पर निर्भर करते हैं । "यह केवल मन ही है जो बंधन या मुक्ति के लिए कारण है" ज्ञानियों का ऐसा मान्ना है । मन को शुद्ध करने के लिए, हमारे ऋषियों (ज्ञानियों) ने हमारे जीवन को शुद्धिकरण के सोलह साधनों (षोडश संस्कारों) में परिवर्तित करने की विधियां स्पष्ट की हैं । उन्होंने हमारी सोच को अमर साहित्य, पवित्र अतीत (इतिहसा) की घटनाओं और अनंत काल (पुराण) की कहानियों, शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणालियों से लेकर गुरुकुलॊं के उत्थान के अन्तर्गत ढाला है।  उन्होंने एक सभ्यता और संस्कृति का निर्माण किया है, जो इस सोच को हमारे दैनिक दिनचर्या में, हमारी आजीविका के साधनों में, उन त्योहारों में, जो हम मनाते हैं, जो हम विभूषित करते और पहनते हैं में एकीकृत किया है । जब ऋषि वाल्मीकि ने सरयू नदी के निर्मल प्रवाह की प्रशंसा की तो उन्होंने इसकी तुलना अनंत (सनमनुष्य मनो यथा) में लीन व्यक्ति के शांत मन से की । यह वह वरदान है जो मन के शुद्ध होने पर प्राप्त होता है। "जिस तरह से एक जंगली हाथी को शिक्षित हाथियों द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है, वैसे ही ज्ञानियों की संगत के उत्कृष्ट प्रभाव द्वारा हमारा मन भी शुद्ध बन जाता है" महान श्री श्रीरंगा महागुरु ऐसे कहते थे । ज्ञानियॊ के संग से हम एक उन्नत मनःस्थिति को प्राप्त कर लेते हैं जिसके द्वारा हम सृष्टी के मूल में व्यवस्थित परमानन्द को प्राप्त कर लेगें ।

सूचन : इस लेख का कन्नड़ संस्करण AYVM ब्लॉग पर देखा जा सकता है |  

Thursday, December 26, 2019

नारियल की महिमा (Nariyal ki mahimaa)

लेखक – तरोड़ी सुरेश
हिन्दी अनुवाद – पूजा धवन


भारतीय संस्कृति में दैनिक जीवन में उपयोग की जाने वाली कई सामग्रियों और विशेष रूप से पूजा (पूजा), त्यौहारों, समारोहों और यहां तक कि गैर-आनन्दकारी गतिविधियों पर भी महत्व देने वाले कई अनुष्ठान हैं। उपयोग की जाने वाली कई सामग्रियों में से, जो प्रत्येक अवसर पर अलग-अलग होती है, सबसे श्रेष्ट है नारियल के विभिन्न भागों का उपयोग । नारियल उस पेड़ के किसी भी हिस्से के लिए उपसर्ग बन जाता है, उदाहरण के लिए नारियल पानी, नारियल क्रीम, नारियल तेल, नारियल कॉयर, नारियल झाड़ू, आदि। हमारे देश में, नारियल और उसके विभिन्न भागों में, इसका अनूठा अर्थ है - भोजन सामग्री, दवा, दान, पूजा में प्रसाद आदि के रूप में। नारियल तीनों हो सकते हैं: एक गिरी, एक अखरोट और एक बीज। 'अखरोट' इतना लोकप्रिय है; यह किराने या सामग्री की पूजा के लिए खरीदारी करते समय एक सह-व्यापारी के रूप में प्रस्तावित हो जाता है। नारियल के 'नट' को अन्य नट्स जैसे बीटल नट, ग्राउंड नट, काजू, अखरोट आदि या अन्य फलों या सब्जियों से मिश्रित नहीं करना चाहिये । नारियल का हर भाग दैनिक जीवन में उपयोग किया जाता है। इसी कारण से, नारियल को "जीवन का वृक्ष" कहा जाता है और पेय, फाइबर, भोजन, ईंधन, बर्तन, संगीत वाद्ययंत्र और अन्य वस्तुएं पैदा कर सकता है। इस प्रकार नारियल के पेड़ को 'कल्प-वृक्ष' (कामना पूर्ण करने वाला दिव्य वृक्ष) के रूप में संदर्भित और सजाया जाता है। इसी कारण से यह सबको आश्चर्यचकित कर देता है किन्तु यह महत्वपूर्ण स्थान केवल नारियल के लिए क्यों? भारतीय पाक में नारियल खाना पकाने के लिए सर्वोत्कृष्ट सामग्री बन जाता है। यह षड्रस (छह स्वाद) के साथ बहुत अच्छी तरह से मिश्रित हो जाता है। यह सुखद है और संगत भी है। यह गुण इसे एक सार्वभौमिक घटक बनाता है। अपने सुखद और शांत गुणों के कारण नारियल का औषधीय महत्व है। यह वात और पित्त को नियंत्रित करने के लिए जाना जाता है; इसके अतिरिक्त्, जब बाहरी रूप से लागू किया जाता है, तो यह त्वचा रोगों में भी प्रभावी है। यह हमारे शरीर को सक्रिय करने के साथ-साथ मस्तिष्क के कार्यों में सुधार करने में लाभकारी है। नारियल का जल (डाब) वात निवारक होता है । यह भी संभव है कि प्रकृति में अन्य सामग्रियां भी हो सकती हैं जिनमें नारियल के समान गुण हो ।


हमारे ऋषियों ने नारियल की महानता के कई कारणों का पता लगाया है। एक कन्नड़ कहावत कहती है "तलये तेंगिनकायि नारायण, बरले बाळॆहन्नु नारायण" - जब यह दशांश होता है, तो इसका अर्थ है, सिर ही नारियल है और उंगलि ही केला । हमारे शरीर में ही नारायन हैं – वह है हमारे सिर और नारियल । हमारा सिर आत्मज्ञान का केंद्र है और इस प्रकार शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। नारियल के दो हिस्सों की तुलना मस्तिष्क के दो भागों (बाएं और दाएं) से की जाती है। ज्ञानियों ने अपनी शिखा (बालों का गुच्छा) "ज्ञानमयी शिखा" का प्रदर्शन किया । इसी तरह, नारियल के गुच्छे को उनके गुच्छे के प्रतिनिधि के रूप में देखा जा सकता है। इसके दोनों खंडों में भ्रूमध्य केंद्र (नेत्र-भौंह के बीच का योगिक केंद्र) और सहस्रार चक्र ("हजार पंखुड़ियों वाला" या मुकुट चक्र) होता है । नारियल का सार सहस्रार चक्र जैसा अत्यन्त मधुर है । आध्यात्मिक आकांक्षी इन दो आध्यात्मिक केंद्रों के बीच दिव्य लिंगाकार में समस्त विश्व के मूल का दर्शन कर सकते हैं । यह भक्ति के माध्यम से प्राप्त किया जाता है । इसी प्रकार्, नारियल अपने दो हिस्सों के बीच सुखद उत्तमांश/ मलाई और दूध रखता है । ज्ञानियों को, सामान्य के विपरीत, तीसरे नेत्र के प्रकार एक सूक्ष्म भावना होती है । यह दिव्य-ज्ञान का आधार है और गहन ध्यान की अवधि में उत्तेजना पर खुलता है। इसी के समान एक तीसरा नेत्र नारियल में भी उपलब्ध है। एक पके हुए नारियल में तीसरे नेत्र के स्थान पर, कदाचित, बीज के समान एक छोटा फूल प्रत्यक्ष हो सकता है। यह एक बाल पौधा है । इसे बड़ी श्रद्धा के साथ सिर पे रखते हैं । यह विश्व के बीजरूप लिंग का प्रतीक है | श्रीरंगमहागुरु ने स्पष्ट रूप से बताया कि निपुण आकांक्षी भ्रूमध्य केंद्र में इस बीज जैसे लिंग का दर्शन कर परमानंद का अनुभव करते हैं।

नारियल के पेड़ का प्रत्येक भाग - खोल, पत्तियां, तना, गुच्छा, फ्रैंड्स - इसे बहुमुखी और इच्छा-पूर्ण दिव्य पेड़ बनाने में उत्पादक उपयोग होता है। ऐसे एक कल्पवृक्ष का फल हैं नारियल | इसी तरह भगवान के संकल्पवृक्ष का फल होता है - चारों पुरुषार्थ | नारियल चार पुरुषार्थों (पीछे की वस्तु) - धर्म (अधिकार अनुशासन), अर्थ (सही संसाधन), काम (सही इच्छा) और मोक्ष (बंधन से मुक्ति) के लिए एक आकार है। इन पुरुषार्थों को प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का जन्म-अधिकार है। दिव्य प्रसाद से पहले नारियल फोड़ना आवश्यक है। इसी प्रकार, ध्यान में मन को भिगोने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए सिर में स्थित सहस्रार को प्रभावित किया जाना चाहिए। ऋषियों ने घोषणा की है कि नारियल एक धन्य, देवता प्रसन्नता दिलाने वाली - दिव्य और शीघ्रफलकारी सामग्री है। लेकिन इन सब बातों से खोकला नारियल अन्वय नहीं हो जाता | यह नारियल है जो हमारे अंदर और बहार के जीवन का दर्पण है और प्रकृति का संस्करण करते हुए सर्वोपकारी है । तथा वहअपने गुणों के लिये भारतीय संस्कृति में सम्मान का स्थान प्राप्त करता है।

सूचन : इस लेख का कन्नड़ संस्करण AYVM   ब्लॉग पर देखा जा सकता है I

Sunday, September 22, 2019

अहंकार से बच के रहिये (Ahankar se bach ke rahiye)

लेखक: श्री के.एस.राजगोपाल
हिन्दी अनुवाद: श्रीमती पूजा धवन



महाविष्णु के निवास स्थान वैकुंठ के द्वार्पाल जय और विजय हैं। एक बार, महान सनक और उनके साथी संत जन महाविष्णु से मिलने आए। अहंकार के कारण, इन ऋषियों की महानता से अवगत होते हुऎ भी, द्वार्पालो ने उन्हें वैकुंठ में प्रवेश करने से रोक दिया ।  ऋषियों ने क्रोध में आकर जय और विजय को शाप दिया: “तुम इस पवित्र स्थान पर रहने के लिए अयोग्य हो ; राक्षसों के रूप में पृथ्वी पर जन्म लो ”। तब महाविष्णु वहाँ स्वयं प्रकट हुए और जय और विजय को दो विकल्प दिए -  याँ तो तीन जन्मों के लिए विष्णु के जन्म जाट शत्रु के रूप में जन्म लेना, याँ सात जन्मों के लिए उनके मित्र के रूप में - उन्होंने उत्सुकता से पहला विकल्प चुना ताकि वे शीघ्र ही वैकुंठ लौट सकें । विष्णु ने अब ऋषियों को संबोधित किया क्योंकि वह उन्हें ज्ञानोदय करना चाहते थे। हस्ते हुए, उन्होंने टिप्पणी की: "यह जय और विजय का अत्यधिक अनुप्युक्ता है, कि आपके समान ऋषियों को द्वार पर रोक दिया, जो कि जितेन्द्रिय के रूप में जाने जाते हैं, (इन्द्रियों के विजेता) और क्रोध पर नियंत्रण के लिए प्रतिष्ठित । मैं व्यक्तिगत रूप से उनकी गलती के लिए क्षमा माँगता हूँ!” तुरन्त ही ऋषियों ने विष्णु के सहायकों के साथ अपने क्रोध पर नियन्त्रन न रखने की अपनी मूर्खता को समझा । यह भारतीय पौराणिक कथाओं के छात्रों के लिए एक प्रसिद्ध कहानी है।      

कई लोग यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जय और विजय का वैकुंठ लौटने का आग्रह समझ में आता है क्योंकि वे अपने प्रभु महाविष्णु से अलग होने में असमर्थ थे।

श्रीरंगा महागुरु ने इस कथा को सुंदर विधान से समझाया था । जब जय-विजय ने दो विकल्पों का सामना किया - शत्रु या मित्र बनने के लिए - और पूर्व को चुना, तो इसका कारण यह था कि शाप पहले से ही फल देने लगा था, इस प्रकार इस विकल्प के प्रति उनकी बुद्धि चली । वे विष्णु के सहयोगी होने के लिए चुन सकते थे, चाहे सात जन्मों के लिए हों या सौ के लिए! वैकुंठ के निवासियों के रूप में, उन्हें अपने मन को हमेशा प्रभु पर रखना चाहिए था । भले ही वे शाप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेते, यदि उनका मन विष्णु के प्रति अगाध रूप से समर्पित होता, न तो जन्मों की संख्या और न ही उनके रेहने का स्थान दोनो ही उपेक्षित है । वे इस सरल सिद्धांत को ही समझ नहीं  पाए! "चाहे स्वर्ग में हो या नरक में, सुख में या दुःख में, मैं हमेशा तुम्हें याद रख सकता हूँ" - इस प्रकार प्रार्थना करना भारतीय संस्कृति की प्रमुखता है।

जय और विजय का प्रसंग समयग रूप से यह दर्शाता है कि कैसे एक महान भक्त भी, अगर प्रसिद्धि या स्थान के लिए एक लालसा विकसित करता है, या इस प्रकार के अन्य स्वार्थों से युक्त होता है, तो जीवन में अपने अंतिम उद्देश्य को भूल सकता है। अगर भगवान विष्णु के सेवादारों के साथ भी ऐसा हो सकता है, तो हममें से बाकी लोगों की क्या बात है? यही कारण है कि बुजुर्गों ने चेतावनी दी "प्रत्यहं प्रत्ययवेक्षेत नरश्चरितमात्मनः। किं नं मे पशुभिस्तुल्यं किं नु सत्पुरुषैरिति” । (एक मनुष्य को प्रति दिन आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि: क्या मैं जानवर की तरह व्यवहार कर रहा हूं या एक महान व्यक्ति की तरह?) पशु केवल स्वाभाविक प्रवृत्ति पर कार्य कर सकते हैं। एक पशु ही है जो जीवन के अन्त तक अपनी मूल प्रवृत्ति के अनुसार जीवन व्यतीत करता है  परन्तु एक मनुष्य ही है जो अपने विवेक से जीवन के परम लक्ष्य अथवा मोक्ष का  जीवन चलाकर उसको सार्थक कर सकता है । इसलिये हमें, अपना वातावरण, संगत, इत्यादियों को अपने लक्ष्य के अनुकूल रख कर गलत विष्यों से अपने आप को बचाकर,  अपने विवेक के साधन से, गलतियां सुधारते हुए अपने लक्ष्य की ओर बडकर जीवन को सार्थक बनाना चहिये ।

सूचन : इस लेख का कन्नड़ संस्करण AYVM   ब्लॉग पर देखा जा सकता है I