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Friday, June 14, 2019

काम :- त्याज्य है या पूज्य ? (Kaam :- thyajya he ya poojy?)

लेखक – डा. मोहन राघवन
हिन्दी अनुवाद – श्रीमती एम.हेच. इन्दिरा




‘काम’ कहने पर ही मुस्कुराते हुए बात बदलनेवाले कुछ लोग होते हैं | कतिपय मानते हैं कि ’ शालााओं में विद्यार्थियो को जानकारी देनेवाले विषय मे से एक यह भी है’ |  काम को नीचभाव  से देखनेवाले और कुछ लोग होते हैं | अधिकतर  लोग इसे  सिनेमा के ‘रोमान्स’ का पर्याय समझते है| 
       
 ‘काम’ से ही समाजका बचाव या नाश दोनों साध्य है| 

काम सृश्टिसहज एक वेग है | इस वेग के न होने से मनुकुल के इस भूतल पर रहना ही सवाल बनकर रह जाता | जन्म से ही यह वेग हम में गुप्त रूप से छिपकर रहके, तारुण्य में स्त्री-पुरुषों के परस्पर आकर्षण के रूप मे इस की  अभिव्यक्ति  चिरपरिचित  ही है | यह आकर्षण यदि समाज के नियमों और जीवन मौल्यौ के अनुसार हो तो यह उचित कहलाता है | यदि  विपरीत हो तो विपत्ति बन पडती है | यह सभी देशों के - सभी जनाङ्ग्  -पशु -पक्षियों के समाज का सामान्य नियम है  |  लेकिन हर समाज मे औचित्य या निषिद्ध कृत्यों की परिभाषा मात्र अलग अलग ही होती  है  | 

प्राचीन  भारत के महर्षी काम की शक्ती और सच्चे स्वरुप से भलीभांति  परिचित थे | काम का मूल रूप है ‘इन्द्रियों की इच्छाओ को तृप्त करने का तीव्र चापल्य ‘| परिस्थिति के अनुसार चपलता बहु रूपों को धरता है | उन्हे यह भी  ज्ञात था  कि अनियन्त्रित चपलता सारे रेखाओं को लाङ्घ् कर भागने वाली अश्व कि भांति है | इसी लिए घोडे को लगाम देने की व्यवस्था को भी साथ ही साथ जोडे | वह कैसे ? ‘कार ‘वेग से चलने के लिए ‘अक्सलरेटर ‘ जैसे रहता है वैसे ही वेग को रोकने के लिए ‘ब्रेक ‘ भी रहता है | ‘ब्रेक ‘ के बिना ‘आक्सीडेंट ‘ निश्चित है | जीवन की गाडी में,काम के वेग की नियन्त्रण के लिए ‘ब्रेक ‘ को जोडकर उसके उपयोग की शिक्षा भी देते थे | वह ‘ब्रेक ‘ ही  ‘इन्द्रियजय ‘ कहलाता है  | अत्यन्त प्रिय खाद्य यदि आँखों के सामने हो पर सेहत के लिये उचित न हो तो चाहते हुए भी उसे नकारने की दृढता है वह 'इन्द्रियजय' | मनोहर पर अनुचित दृश्यों के आँखों के सामने रहने पर भी दृष्टि हटाने की धृति है वह | ऐसे इन्द्रिय जय के बहुत उदाहरण है | मगर यदि हमेशा  ही सब कुछ नकारते ही रहें तो यह बात ऐसे हो गयी जैसे ‘गाडी पर ब्रेक लगाना आता है; पर गाडी चला नहीं सकते’| भीड भरी वीथियों मे धीरे चलाना भी जानो और हाईवे पर गाडी 120 कि.मी. की तेजी से चलाओ तभी तो 'वाह -वाह' होगी | ठीक उसी प्रकार ही इन्द्रियों के चाहते हुए भी अनुचित को मना करने का सामर्थ्य, और अनुमति हो तो भोग करने कि कुशलता रहनी चाहिये | एसे रहने पर ही जीवन में एक ‘बालेन्स ‘ रहता है | इसी अवस्था को हमारे ऋषियों ने ‘धर्म‘ शब्द से संबोधित किया | 

अर्थ का अर्जन और काम के सेवन के लिए धर्म का ‘लैसेन्स ‘चाहिए :-

भारतीय जीवनव्यवस्था में कामों का भोग और अर्थ का सम्पादन दोनों के लिए अनुमति या लैसेन्स देने के पहले दीर्घ समय तक धर्म की   शिक्षा देते थे | वही ब्रम्हचर्य - गुरुकुलवास कहलाता है| वहाँ आज की तरह केवल पुस्तकों के पाठ ही नहीं बल्कि तपस्या से मस्तक को प्रकाशित करने का पाठ भी था | धर्म को आत्मसात करने का अभ्यास था | यह शिक्षा को जो पूर्ण करेगा वही ‘स्नातक‘ पद प्राप्त करने योग्य रहता था | ऐसे ब्रह्मचर्य और तपस्या से पूत जो धर्मिष्ठ हैं वे कामों के भोग से मर्यादा का उललंघन नहीं करते | ऐसे कर्मों मे उनकी रुचि बनती ही नहि | इसी को श्रीमद् भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘’धर्माविरुद्धो  भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ’’| श्री कृष्ण का कहना है कि धर्म के अनुसार होने पर मैं ही स्वतः काम  हूँ | इस तरह धर्मार्जन के बाद यदि अर्थ -कामों का भोग करें तो ऐसा व्यक्ति गृहस्थ -जीवन में उदारभाव से लोक -कल्याण के लिए अर्थ और कामों का सेवन करता है | न कि अपने स्वार्थ या इन्द्रियों की चपलता के लिए | ऐसा धर्मात्मा समय के बीतते तारुण्य के उपरान्त  वृद्दावस्था के आने पर विचलित न होते हुए वैराग्य से भोग को त्यागकर तपस्या का आश्रय लेता है | पुराने कपडों की भाँति निरातंक होकर शरीर का त्याग करता है | इसका वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास कहते  है 

  ‘’शैशवेभ्यस्थ विद्यानां यौव्वने विषयैषिणाम् वार्धक्ये मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजां "

 यह विषय आज भी प्रसक्त है क्या ?

हमारे मन मे यः सवाल  उठ सक्ता है कि 'पुराने जमाने की बात आज हम क्यों दोहरा रहे हैं' ? पर काम के वेग से भरे इस शरीर की  गाड़ी को हम आज भी चलाते आ रहे है | सुखदायक और सुभद्र जीवन की गति को चाहनेवालों  के लिये यह विषय आज भी प्रसक्त है | चाहे हमारे सडकों मे हो या समाज मे; आज भी ‘अशिक्षित चालक‘ ही अपघात का कारण बने घूम रहें हैं | यह बात भूत और वर्तमान काल दोनों मे  सच ही कहलायेगा | ‘धर्म ‘ का लैसेन्स रहे तो काम पूज्य है | नहीं तो अपघात का आह्वान मानकर सर्वथा त्याज्य ही है |

Note: The Kannada version of this article can be viewed at AYVM blogs

Sunday, April 21, 2019

मेरा देश है भुवनत्रय (Mera desh bhuvanatray)

मूल लेखन: सुब्रह्मण्य सोमयाजी 
हिन्दी अनुवाद: श्रीमती  इन्दिरा  एम्.हेच 




कौन सा है आपका देश? भारतियों का  भारत, इंग्लंडवालों का इंग्लैण्ड, अमेरिकावालों का अमेरिका,जापानियों का जपान | इसमें विशेषता क्या है ? सामान्य तौर से जो भूमि हमारे जन्म एवं  विकास के लिए कारण बनी वह भूमि ही हमारा देश है | स्वदेश वह  हैं  जहाँ हमारा जीवन   व्यतीत  हुआ हो  | हम जिसमे बसे हैं वह भूमि | अपने देश के प्रति निष्ठा, प्रीति सभी देशवासियों में रहना स्वाभाविक है | 

मगर हमारी शीर्षिका  कहती  है ' भुवनत्रय ही मेरा देश है '| 'स्वदेशो भुवनत्रयं'| यह वाक्य इस देश के महर्षियों की बोली है | सिर्फ हमारे रहनेवाले भौगोलिक प्रदेश मात्र ही नहीं, तीनों लोक हमारा देश कहलाता है | यह कैसे संभव हो सकता है ? यह  सिर्फ हृदयविशालता का प्रदर्शन  मात्र है क्या ? अथवा बढ़ा चढ़ाकर किया गया एक दावा  है क्या ? क्या इस बात के पीछे कोई सार है ? इसका विवेचन इधर अवश्यक  है|  

यहाँ ‘ स्व’ माने हम पर शासन करनेवाले जीवशक्ति है| हमें जीवितरहने के लिए, बातचीन करने के लिए, उतना ही क्या हमें उच्वास-निश्वास के लिए भी हमारे पीछे रहे जीवशक्ति  का अवलम्बन चाहिए | हमारा   अस्तित्व   जीव के रहने पर निर्भर है| महर्षियों  के आनुभविक ज्ञान की तरह इस चेतन की व्याप्ति तीनों लोकों तक व्याप्त है| वे तीन  लोक कौन से है? बाहर दिखनेवाले स्थूल 'भूः' इस स्थूललोक की आसरा  पृष्ठभूमि  में विराजमान  सूक्ष्मलोक "भुवः'’ |  यह  देवों का  साम्राज्य है | उसका  भी आधार है सर्वमूल  परब्रह्मलोक  ‘परा’- 'सुवः'|  जब जीवशक्ति तपस्या से इन तीनो लोकों तक व्याप्त होने की क्षमता पालेति है, तब उस उन्नत स्थीति से ‘’स्वदेशो  भुवनत्रयं" जैसे सत्ययुक्त उद्गार निकलते हैं |    
  
ऐसे तीनो लोकों में संचार करके अंतरनुभव [पूर्ण ] महर्षियों  ने सिर्फ अपने भौतिक भू भागो  को  स्वदेश नही माना | इन लौकिक भूभागों के जो आधार है, वासस्थान है, उस परब्रह्मवस्तु जिन देशों में व्यक्त है उन सभी देशो को भी स्वदेश ही माना है |  तीनों लोकों तक व्याप्त जीवन है उनका |  इसीलिए ‘स्वदेशो भुवनत्रयं’’ एक अनुभवसिद्ध बात है |   

सिर्फ इन्द्रियक्षेत्रो में ही रहनेवाले हमें इंद्रियों के भी पीछे रहकर  चैतन्य देनेवाले अतीन्द्रियक्षेत्र का, सूक्ष्म और परा दृष्टियों का ज्ञान नहीं है | इसीलिए हम एक परिमित क्षेत्र को ही हमारा देश समझते है| लेकिन सर्वव्यापी परमात्मा के सुख में रहनेवाले महर्षिलोगो के लिये अपरिमित क्षेत्र को ही अपना देश कहना सहज है| वैसे अंतरनुभव से जुडी हुई बात है ‘ स्वदेशो भुवनत्रयं' | यह सिर्फ भावनात्मक बात नहीं| यह अनुभव से आनंदित होनेवाले की वास्तविक घोषणा है |  इसी को पुष्ट करनेवाले एक सुभाषित है- 
       ‘’ अयं निजः पारो वेति  गणना लघुचेतसां | 
          उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बककं ||”

इसका अर्थ है कि “यह मेरा है,’’ यह औरों का है’’ यह संकुचित मनोभाव रखनेवालों की आलोचना है| मगर सभी जीव-जंतुवो  में सर्वमूल भगवान को ही देखनेवाले उदारचरितों  के  लिए सारा विश्व अपना एक कुटुम्ब जैसे प्रतीत होना  स्वाभाविक ही  है | 

सारे जगत को इस उदारभावना से देखने के लिए सर्वव्यापी परमसत्य का अनुभव होना अवश्यक है | वैसे अनुभव को ही जीवन का परम लक्ष्य मानकर जीवकोटियों के जेवनो को  आनंदभरित  करने हेतु मन, घर, देश अतः सारे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधकर आगे चलनेवाली भूमि है हमारा भारत | ऐसे अंतरंग  की अनुभूति से व्याप्त जीवनदर्शन है ‘ स्वदेशो भुवनत्रयं’ | 


Note: The Kannada version of this article can be viewed at AYVM blogs